Satyashodhak Samaj – सत्यशोधक समाज की पूरी जानकारी पढ़ें

आज के आर्टिकल में हम सत्यशोधक समाज (Satyashodhak Samaj) के बारें में पढ़ेंगे। इसके अन्तर्गत हम सत्यशोधक समाज की स्थापना (Satyashodhak Samaj Ki Sthapna), सत्यशोधक समाज के उद्देश्य (Satyashodhak Samaj Ki Uddeshya), सत्यशोधक समाज के कार्य (Satyashodhak Samaj Ke Karya), सत्यशोधक समाज का प्रसार (Satyashodhak Samaj Ka Prasar), ज्योतिबा फुले का जीवन परिचय (Jyotiba Phule Ka Jivan Parichay) आदि के बारे में जानेंगे।

सत्यशोधक समाज – Satyashodhak Samaj

Satya Shodhak Samaj

 

जब 19 वीं सदी में भारतीय समाज में जातिगत भेद-भाव, ब्राह्मणवाद का वर्चस्व, अशिक्षा, निम्न जाति व दलित वर्ग के लोगों का शोषण, अशिक्षा, समाज में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, असमानता, स्त्री-पुरुष असमानता आदि व्याप्त थे जब सामाजिक परिवर्तन के उद्देश्य से ही ज्योतिबा फुले ने सत्यशोधक समाज (Satyashodhak Samaj) की स्थापना की थी। महात्मा फुले भारत में सामाजिक परिवर्तन की लङाई के अगुवा है।

अपने विचारों एवं कार्यों से उन्होंने पिछङे वंचित समाज को वर्ण-व्यवस्था के भेदभावकारी, शोषणकारी चंगुल से आजादी के लिए निर्णायक संघर्ष का नेतृत्व किया। ज्योतिबा फुले ने अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले के साथ मिलकर महिलाओं की मुक्ति के लिए भी प्रयास किया। संविधान निर्माता बाबा साहेब अंबेडकर महात्मा ज्योतिबा फुले को अपना प्रेरणास्रोत मानते थे।

ज्योतिबा फुले (Jyotiba Phule) को 19 वीं सदी के प्रमुख समाज सेवक माना जाता है। उन्होंने भारतीय समाज में फैली कुरीतियों को दूर करने के लिए सतत संघर्ष किया था। ज्योतिबा फुले को भारतीय सामाजिक क्रान्ति का जनक माना जाता है। ज्योतिबा फुले महान विचारक, कार्यकर्ता, समाज सुधारक, लेखक, दार्शनिक, संपादक और महान् क्रांतिकारी थे।

उन्होंने जीवन भर पिछङी जाति, महिलाओं और दलितों के उद्धार के लिए काम किया था। इस काम में उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले ने भी पूरा योगदान दिया। उन्होंने स्त्री-शिक्षा और स्त्रियों के उत्थान के लिए भी कार्य किये। महात्मा ज्योतिबा फुले ने जाति आधारित भेदभाव के दंश को समाप्त करने का प्रण लिया था।

1848 ई. में ज्योतिबा फुले अपने एक उच्च-जाति के मित्र के विवाह में शामिल होने के लिये गये। विवाह-समारोह के दौरान उसके मित्र के रिश्तदारों ने उनको पिछङी-जाति का होनेे के कारण उनका काफी अपमान किया। इसके बाद ज्योतिबा फुले ने जाति-प्रथा को जङ से समाप्त करने का संकल्प लिया। उन्होंने इसकी शुरूआत महिलाओं के सशक्तिकरण के साथ करने का फैसला लिया, क्योंकि उस समय समाज में स्त्रियों की स्थिति बिल्कुल ही खराब थी। उनका मानना था कि जब तक समाज में स्त्रियों और पिछङी जाति के लोगों का उत्थान नहीं होगा तब तक जाति-प्रथा जैसी कुरीतियों का समाधान संभव नहीं है।

प्रेरणा स्रोत –

ज्योतिबा फूले ने शिवाजी और अमेरिका के जाॅर्ज वाशिंगटन के जीवन से, टाॅमस पेन की पुस्तक ’राइट्स ऑफ़ मैन’ (सामाजिक न्याय की गहरी समझ विकसित की), वासुदेव बलवंत फङके से प्रेरित होकर उन्होंने सत्यशोधक समाज (Satya Shodhak Samaj) की स्थापना की। इनसे प्रेरित होकर ज्योतिबा फुले भारतीय जाति-व्यवस्था के कुट आलोचक बन गये थे और उन्होंने जाति-प्रथा को समाप्त करने की ठान थी।

उन्होंने तर्क दिया कि महिलाओं और पिछङी जाति की असमानताओं को दूर करने के लिए शिक्षा एक महत्त्वूपर्ण कारक है। ज्योतिबा फुले को यह अहसास हो गया था कि ईश्वर के सामने स्त्री-पुरुष दोनों का अस्तित्व बराबर है फिर दोनों में भेदभाव करने का कोई मतलब नहीं है। उस समय लङकियों एवं महिलाओं की दशा अत्यंत शोचनीय थी। लङकियों को पढ़ने-लिखने की अनुमति नहीं थी।

ज्योतिबा फुले एवं सावित्री फुले ने मिलकर निम्न-जाति एवं पिछङे तबके की लङकियों को शिक्षा देने के लिए 1848 ई. में पुणे (महाराष्ट्र) में एक स्कूल खोला गया, जो भारत का ’प्रथम बालिका विद्यालय’ कहलाता है। उनकी पत्नी सावित्री बाई फुले ने वहाँ अध्यापन का काम किया। ज्योतिबा फुले सामाजिक बुराईयों के खिलाफ लङते रहे। 1851 में और बेहतर स्कूल शुरू किया, जिसमें जाति, धर्म और पंथ के आधार पर कोई भेदभाव नहीं था। उस स्कूल के दरवाजे सभी के लिए खुले थे।

ज्योतिबा फुले (Jyotiba Phule) का मानना था कि समाज में बदलाव लाने की शुरुआत घर से होनी चाहिए। उस समय ऐसा करने की हिम्मत करने वाले वो पहले समाज सुधारक थे।

सत्यशोधक समाज की स्थापना – Satyashodhak Samaj Ki Sthapna

ज्योतिबा फुले ने शूद्र एवं अस्पृश्य जाति के लोगों को उत्पीङन से मुक्ति दिलाने के लिए 24 सितम्बर 1873 ई. को पुणे में सत्यशोधक समाज (Satyashodhak Samaj) की स्थापना की। सत्यशोधक समाज का तात्पर्य है कि सत्य की खोज करने वाला समाज। ज्योतिबा फुले इसके अध्यक्ष थे तथा उनकी पत्नी सावित्री बाई फुले महिला विभाग की प्रमुख बनी थी। सत्यशोधक समाज एक ब्राह्मण विरोधी संस्था थी। जब इस संस्था की स्थापना हुई उस समय समाज में सुधारों का प्रयास करने वाले कई संगठन सक्रिय थे, जैसे – प्रार्थना समाज, ब्रह्म समाज, आर्य समाज, वेद समाज आदि।

इस संस्था का मुख्य उद्देश्य – पिछङी जातियों को शोषण से मुक्त कराना था। ज्योतिबा फुले ने मूर्ति-पूजा का विरोध किया तथ चतुर्वर्णीय जाति व्यवस्था को ठुकरा दिया। इस संस्था ने समाज में तर्कसंगत विचारों को फैलाया और शैक्षणिक और धार्मिक विधाओं के रूप में उच्च-वर्ग को स्वीकार करने से इन्कार कर दिया। सत्यशोधक समाज पूरी तरह से गैर-राजनीतिक संगठन था।

सत्यशोधक समाज की मान्यता थी कि भक्त और भगवान के बीच किसी बिचौलिये की कोई आवश्यकता नहीं है। बिचौलिये की तरफ से लांघी गई धार्मिक दासता को खत्म करना और सभी जातियों के स्त्री-पुरुषों को शिक्षा उपलब्ध कराना ही सत्यशोधक समाज का उद्देश्य था।

सत्यशोधक समाज के उद्देश्य – Satyashodhak Samaj Ki Uddeshya

  • पुरोहितों की अनिवार्यता धार्मिक-सांस्कृतिक कार्यों में से खत्म करना।
  • निम्न-जाति एवं पिछङी जाति के लोगों को शिक्षा के प्रति प्रोत्साहित करना।
  • लोगों में एकता की भावना पैदा करना।
  • जाति पर आधारित उत्पीङन से मुक्त करना।
  • ब्राह्मण, पुरोहित, सूदखोर आदि की सामाजिक-सांस्कृतिक दासता से मुक्ति दिलाना।
  • शिक्षित एवं बेरोजगारी से पीङित पिछङे वर्गों के युवाओं को प्रशासनिक क्षेत्र में रोजगार उपलब्ध करवाना।

सत्यशोधक समाज का प्रसार – Satya shodhak Samaj Ka Prasar

  • ज्योतिबा फुले की अनूठी कार्यशैली की वजह से सत्यशोधक समाज (Satyashodhak Samaj) का जल्द ही प्रसार हो गया।
  • कोल्हापुर के शासक शाहू महाराज ने इस संस्था को भरपूर वित्तीय और नैतिक समर्थन दिया।
  • पिछङी जातियों को ज्योतिबा फूले पर भरोसा था। इसलिए पिछङी जाति एवं दलित वर्ग ज्योतिबा फुले के इस सत्यशोधक समाज में जुङने लगी।
  • पिछङी जातियों एवं दलित वर्गों, महिलाओं को ज्योतिबा फूले ने शिक्षा से जोङा था। शिक्षा को प्रोत्साहन देने के कारण भी पिछङी जातियाँ एवं महिलाएँ इस संस्था से जुङ गए।
  • इस संस्था की शाखाएँ मुंबई और पुणे शहर तक पहुँच गई।
  • कुछ ही समय में महाराष्ट्र में भी इसकी सम्पूर्ण शाखाएँ फैल गयी।
  • इस समाज में सभी लोगों को शामिल होने की स्वीकार्यता थी।
  • लोगों ने धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यों में पुरोहित को बुलाना छोङ दिया।
  • इसी समय ज्योतिबा फुले ने 1873 ई. को ’गुलामगिरी’ नामक पुस्तक लिखी। इस पुस्तक के माध्यम से उन्होंने ब्राह्मणों के प्रभुत्व को चुनौति दी एवं पुरोहित वर्ग को समाज का शोषक बताया। इनकी ये पुस्तक आज भी समाज में हो रहे भेदभाव पर खरी उतरती है।
  • जनवरी 1877 ई. में ज्योतिबा फुले ने ’दीनबन्धु’ नामक एक समाचार-पत्र प्रकाशित किया। उन्होंने किसानों और श्रमिकों की स्थिति संतोष जनक स्थिति और उनकी उपयुक्त मांगों के लिए उन्हें एकजुट होकर संघर्ष करने के लिए प्रेरित, शिक्षित और संगठित किया। सत्यशोधक समाज के आंदोलन में दीनबंधु समाचार-पत्र ने भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • ज्योतिबा के प्रयासों से उन दिनों किसानों और श्रमिकों के हितों की रक्षा और सत्य शोधक समाज (Satya Shodhak Samaj) के प्रचार के लिए ’दीनमित्र’ और ’किसानों का हिमायती’ नामक समाचार-पत्र प्रकाशित किये गये।

सत्य शोधक समाज के कार्य – Satya Shodhak Samaj Ke Karya

  • ब्राह्मणवाद और उसकी कुरीतियों के विरुद्ध आवाज उठाई गई थी।
  • निम्न जाति के लोगों एवं स्त्रियों को शिक्षित कर उन्हें अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करने के प्रयास किये।
  • शिक्षा के प्रसार हेतु 1851 में पुणे में एक स्कूल खोला।
  • सामाजिक सेवा।
  • दलितों के शोषण तथा दुर्व्यवहार पर अंकुश लगाया।
  • समाज में जाति प्रथा उन्मूलन एवं सामाजिक-आर्थिक समानता के पक्ष में उन्होंने जस्टिस/न्याय समाचार पत्र प्रकाशित किया।
  • पुरोहित वर्ग को समाज का शोषक माना गया।
  • महाराष्ट्र में कई स्थानों पर विधवा पुनर्विवाह कार्यक्रम प्रारंभ किया।
  • उन्होंने मूर्ति पूजा, कर्मकाण्डों, पुजारियों के वर्चस्व, पुनर्जन्म और स्वर्ग के सिद्धांतों का विरोध किया।
  • समाज में ब्राह्मणों के वर्चस्व को समाप्त करना तथा दलितों की पहचान बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

ज्योतिबा फुले की मृत्यु के पश्चात् कोल्हापुर के क्षत्रपति साहू महाराज द्वारा ’सत्यशोधक समाज’ चलाया गया।

ज्योतिबा फुले के कार्य -Jyotiba Phule Ke Karya

  • 1854 में विधवाओं के लिए आश्रम भी बनवाया।
  • उन्होंने पुरोहित के बिना ही विवाह-संसार आरम्भ करवाया और इसे मुम्बई हाईकोर्ट से भी मान्यता मिली।
  • उन्होंने दलितों को अपने घर के कुएँ का प्रयोग करने की अनुमति दी।
  • पिछङी जातियों एवं महिलाओं में अंधविश्वास के कारण पैदा हुई आर्थिक और सामाजिक विकलांगता को दूर करने के लिए भी उन्होंने आंदोलन चलाया।
  • विधवाओं और महिला कल्याण के लिए भी काफी कार्य किये।
  • किसानों की हालत सुधारने के लिए भी काफी प्रयास किये।
  • सन् 1954 में ज्योतिबा फुले प्रथम भारतीय थे, जिन्होंने अछूतों के लिए स्कूल खुलवाया।

ज्योतिबा फुले का जीवन परिचय –  Mahatma jyotiba phule Ka Jivan Parichay

जन्म – 1827 ई.
मृत्यु – 1890 ई.
स्थान – महाराष्ट्र के पुणे में
पिता – गोविन्द राव
माता – चिमना बाई
पत्नी – सावित्रीबाई फुले
पूरा नाम – ज्योतिराव गोविन्दराव फुले
पुस्तक – गुलामगिरी (1873), सार्वजनिक सत्यधर्म
समाचार-पत्र – दीनबंधु (जनवरी 1877), जस्टिस (1872 ई.)
समाज की स्थापना – सत्यशोधक समाज (24 सितम्बर 1873 ई.)
उपाधि – महात्मा (1888 ई.)

19 वीं शताब्दी में भारतीय समाज अंधविश्वासी परम्पराओं और नवीन विचारों के द्वन्द्व में उलझा हुआ था। ऐसे ही विषमता भरे परिवेश में महाराष्ट्र के धरती पर ज्योतिबा फुले का जन्म हुआ।

ज्योतिबा फुले का जन्म 11 अप्रैल 1827 को महाराष्ट्र के सतारा में एक शुद्र माली परिवार में हुआ था। ज्योतिबा के पिता का नाम गोविन्द राव थे। इनके पिता फूलों का व्यापार करते थे। इनकी माता का नाम चिमना बाई था। जब ज्योतिबा फुले 9 माह के थे तभी इनकी माता चिमना बाई की मृत्यु हो गई थी। तब ज्योतिबा फुले का लालन-पालन ’सगुना बाई’ नामक एक दाई ने किया था। सगुना बाई ने उनको प्राथमिक रूप से शिक्षाएँ दी थी, क्योंकि महाराष्ट्र की सामाजिक स्थिति के अनुसार यहाँ केवल ब्राह्मणवाद का वर्चस्व था। निम्न-जाति के लोगों को शिक्षाएँ नहीं दी जाती थी।

ज्योतिबा फुले को 7 वर्ष की आयु में जातिगत भेद-भाव के कारण स्कूल छोङना पङा। फिर इनकी शिक्षा सगुना बाई ने घर पर ही दी थी। इनका पूरा नाम – ज्योतिराव गोविन्दराव फुले था। अरबी-फारसी के विद्वान गफ्फार बेग मुंशी एवं फादर लिजीट के सहयोग से उन्होंने अपनी अधूरी शिक्षा पूर्ण की थी। 1840 में ज्योतिबा फुले का विवाह सावित्रीबाई से हुआ था। उनके काम में उनकी पत्नी ने बराबर योगदान दिया। सावित्रीबाई पढ़ी-लिखी नहीं थी। बाद में ज्योतिबा फुले ने ही उन्हें शिक्षा दी। उनकी पत्नी सावित्री फुले भारत की प्रथम प्रशिक्षित महिला शिक्षिका बनीं।

उन्होंने ’जस्टिस’ समाचार-पत्र प्रकाशित किया। इसमें उन्होंने अछुतों के हितों की वकालत की।

ज्योतिबा फुले की पुस्तकें
गुलामगिरी
तृतीय रत्न
छत्रपति शिवाजी
इशारा ब्राह्मणों की चालाकी
राजा भोंसले का पखङा
किसान का कोङा
अछूतों की कैफियत
सतसार अंक
सार्वजनिक सत्यधर्म।

1885 ई. में इसारा में कृषक वर्ग की आर्थिक स्थिति पर ज्योतिबा फुले ने अपने विचारों को प्रकाशित किया। 1888 ई. में समाज सुधारक ’विट्ठलराव कृष्णाजी वान्देकर’ ने मुंबई में एक सभा आयोजित की, इस कार्यक्रम में विट्ठलराव कृष्णाजी वान्देकर ने इनके सामाजिक सुधार के कार्यों के लिए ज्योतिबा फुले को ’महात्मा’ की उपाधि दी। ज्योतिबा फुले ने ’भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ का विरोध किया, क्योंकि यह कृषकों की समस्याओं को हल करने में असमर्थ थे। ज्योतिबा फूले बाल विवाह के खिलाफ थे। विधवा विवाह के समर्थक थे। ज्योतिबा फूले ने विधवा पुनर्विवाह की शुरुआत की।

ज्योतिबा फूले ने कहा था कि ’मनुष्य के लिए समाज सेवा से बढ़कर कोई धर्म नहीं।’ ज्योतिबा फुले की संत-महात्माओं की जीवनियाँ पढ़ने में बङी रुचि थी। ज्योतिबा फुले ने अपने काम से अनेक लोगों को प्रभावित किया। डाॅ. भीमराव अंबेडकर भी उनसे काफी प्रभावित हुए। महात्मा की राह पर चलते हुए उन्होंने पिछङों के उत्थान के लिए कई काम किये। जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण आज देखा जा सकता है।

28 नवम्बर 1890 को ज्योतिबा फुले का निधन हो गया। उनके देहान्त के बाद सावित्री बाई फुले ने ’सत्यशोधक समाज’ की बागडोर संभाली। महात्मा फुले की मृत्यु के बाद उनके अनुयायियों ने सत्य शोधक समाज को दूर दूर तक पहुँचाने का काम किया। गाँधीजी उन्हें सच्चा महात्मा कहते थे और उन्हें अपना प्रेरणा स्रोत मानते है। बाबा साहेब अम्बेडकर उनके सामाजिक दर्शन से प्रभावित ही नहीं थे बल्कि उन्हें भगवान बुद्ध और कबीर दोनों के साथ अपना तीसरा गुरु मानते थे।

आज भी लोग ज्योतिबा के कार्यों से प्रभावित हो रहे है। सत्यशोधक समाज के माध्यम से उन्होंने पिछङों को अपने विकास और मार्ग-प्रतिष्ठा अर्जित करने का जो रास्ता करीब सालों पहले दिखाया था, सामाजिक न्याय के लिए वो आज उतना ही जरुरी और प्रासंगिक है। ज्योतिबा फुले के विचार आज भी प्रासंगिक है और राष्ट्र एवं जीवन को प्रभावित करते है।

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