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Guru Tegh Bahadur – गुरु तेग बहादुर की पूरी जानकारी पढ़ें

आज के आर्टिकल में हम गुरु तेग बहादुर (Guru Tegh Bahadur) के बारे में पढ़ेंगे। जिसके अन्तर्गत गुरु तेग बहादुर जी का जीवन परिचय (Guru Tegh Bahadur Biography in Hindi), गुरु तेग बहादुर जी द्वारा गुरुगद्दी संभालना (Guru Teg Bahadur History in Hindi), सिख धर्म का प्रचार (Sikh Guru Tegh Bahadur), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत (Guru Tegh Bahadur’s Martyrdom) के बारे में जानेंगे।

Table of Contents

गुरु तेग बहादुर – Guru Tegh Bahadur

गुरु तेग बहादुर

 

गुरु तेग बहादुर जीवनी – Guru Tegh Bahadur Biography in Hindi
जन्म 21 अप्रैल, 1621 ई. (18 अप्रैल, 1621 ई.)
जन्मस्थान अमृतसर, पंजाब
मृत्यु 11 नवंबर 1675 (24 नवम्बर, 1675)
मृत्युस्थान चांदनी चैक, दिल्ली (54 वर्ष की उम्र)
समाधिस्थल शीशगंज साहिब
पिता गुरु हरगोविंद साहिब
माता नानकी जी
बचपन का नाम त्यागमल
बाद में नाम गुरु तेग बहादुर
समय 1664-1675
धर्म सिख
पत्नी माता गुजरी कौर (4 फरवरी 1633)
पुत्र गुरु गोविन्द सिंह
उपाधि सिक्खों के नौवें गुरु, तेग बहादुर, हिन्द-दी-चादर

गुरु तेग बहादुर का जन्म कब हुआ था – Guru Tegh Bahadur ka Janm Kab Hua Tha

गुरु तेग बहादुर (Guru Tegh Bahadur)  का जन्म 21 अप्रैल 1621 ई. (18 अप्रैल 1621) को अमृतसर (पंजाब) में हुआ था। आपके पिता श्री गुरु हरगोबिंद सिंह और माता नानकी जी थे। श्री हरगोबिंद साहिब (1606-1644) जी सिखों के छठें गुरु थे। गुरु तेग बहादुर जी के बचपन का नाम त्यागमल था। गुरु तेग बहादुर जी बचपन से ही संत स्वरूप, अडोल चित, गंभीर और निर्भय स्वभाव के थे। 1634 ई. में वे अपने माता-पिता के साथ करतारपुर आ गए थे। हरगोबिंद साहिब जी गुरु तेग बहादुर से काफी प्रेम करते थे।

लोग हमेशा कहा करते थे, ’’तेग बहादुर जन्म से ही दिव्य पहचान के साथ आए है।’’

गुरु तेग बहादुर जी की शिक्षा – Guru Tegh Bahadur ki Shiksha

गुरु हरगोबिंद साहिब जानते थे कि तेग बहादुर बहुत ही बहादुर व परोपकारी है इसलिए उन्होंने उनके लिए हर तरह के आवश्यक प्रशिक्षण पर जोर दिया। उन्हें साक्षरता के लिए भाई गुरदास जी को सौंप दिया। गुरदास जी से आपजी ने संस्कृत, हिंदी और गुरुमुखी सीखी। इसके बाद उन्हें श्रम और अन्य सद्गुणों के महत्त्व को सीखने के लिए बाबा बुदा जी के पास भेजा गया। इसके अलावा तेग बहादुर जी ने बङी ही गहराई से गुरुबानी का अध्ययन किया।

बाबा बुध जी से आपजी ने तलवार चलना और तीरंदाजी सीखी। जब गुरु तेग बहादुर जी सिर्फ 13 वर्ष की आयु के थे, तब आपजी को गुरु हरगोबिंद जीने ने तलवार चलाना सीखाया। गुरु हरगोबिंद जी अपने बालक के लिए कहा करते थे कि एक दिन हमारा बेटा निश्चित रूप से तेग चलाने में अमीर होगा और जब वह बङे हुए तो उन्होंने ऐसा ही किया, भक्ति व शक्ति दोनों उनके पास रही।

गुरु तेग बहादुर नाम क्यों पङा – Guru Teg Bahadur in Hindi

जब गुरु तेग बहादुर (Guru Tegh Bahadur) अपने परिवार के साथ करतापुर में रह रहे थे, तभी करतापुर पर मुगलों ने आक्रमण किया था। 1635 ईस्वी में 26 से 28 अप्रैल तक यहां आपजी ने अपने पिता गुरु हरगोबिंद सिंह के साथ मिलकर करतापुर की रक्षा वहाँ घेराबंदी की और मुगलों के खिलाफ चौथी जंग लङी थी। इस समय आपजी की उम्र मात्र 14 वर्ष थी।

गुरु गोबिंद सिंह और त्यागमल जी के पराक्रम की वजह से करतारपुर को सिखों ने सफलतापूर्वक मुगलों से बचा लिया। त्यागमल जी की तेग (तलवार) की बहादुरी तथा युद्ध में महान वीरता एवं पराक्रम देखकर आपजी के पिता जी ने आपजी का नाम त्यागमल से ‘तेग बहादुर’ रख दिया था। तेग बहादुर का शाब्दिक अर्थ – ’बहादुर तलवारधारी’ होता है।

गुरु तेग बहादुर का विवाह – Guru Tegh Bahadur ka Vivah

गुरु तेगबहादुर जी (Guru Teg Bahadur) का विवाह करतारपुर के लालचंद की पुत्री ’माता गुजरी कौर’ के साथ 4 फरवरी 1633 (15 आश्विन, संवत् 1689) में हुआ था। 1966 को पटना में गुरु तेग बहादुर जी के घर गोविंद राय का जन्म (Guru Gobind Singh ji Birthday) हुआ। जो आगे चलकर सिक्खों के दसवें गुरु ’गुरु गोबिंद सिंह’ कहलाये।

आध्यात्मिक चिंतन की ओर झुकाव – Guru Teg Bahadur

अपने विवाह के बाद गुरु तेगबहादुर जी एकांत में रह कर परमात्मा का नाम जपते रहते थे। आप अपना अधिकांश समय ईश्वर के ध्यान-मनन में लगाते थे और धीरे-धीरे आपजी लोगों से अलग होने लग गए थे। सन् 1644 में जब आपजी के पिता गुरु हरगोबिंद सिंह जी का स्वर्गवास हो गया, उसके बाद आपजी अपनी पत्नी और अपनी मां के साथ ’बकाला गांव’ में चले गए। जहाँ आप 2 वर्षों तक रहे। यहाँ आपजी का मन आध्यात्मिक चिंतन की ओर झुकने लगा।

बकाला गांव में तेग बहादुर जी अपना अधिकतर समय एक भूमिगत कमरे में बैठकर ध्यान लगाने में बिताते थे। धैर्य, वैराग्य और त्याग की मूर्ति तेग बहादुर जी ने एकांत में बैठकर लगातार 20 वर्षों तक ’बाबा बकाला’ नामक स्थान पर कठोर साधना की। गुरु तेग बहादुर जी सिखों के आठवें गुरु ’श्री गुरु हरिकृष्ण साहिब’ से मिलने के लिए दिल्ली गये।

गुरु तेग बहादुर जी द्वारा गुरुगद्दी संभालना – Guru Teg Bahadur History in Hindi

सिखों के आठवें गुरु ’श्री गुरु हरिकृष्ण साहिब’ (1661-1664) 30 मार्च, 1664 ई. को ज्योति-जोत समा जाने से पहले वो सब भक्तों को ’बाबा बकाला’ का संकेत कर गये थे कि ’नवम पातशाह बाबा बकाला’ में है। जब भक्तों को इस बात का पता चला तो वह नौवें गुरु की तलाश में व्याकुल होने लगी। इन सबका फायदा उठाकर बकाला गांव में अपने आप को गुरुगद्दी का मालिक बताकर लगभग 22 ढोंगी गुरु बनकर बैठ गये। सही गुरु की खोज ’मक्खन शाह लुबाना’ ने की।

मक्खन शाह लुबाना गुरु जी से प्रेम करने वाला एक व्यापारी था। एक दिन उनका सामान से भरा हुआ जहाज आंधी और तूफान की चपेट में आ गया। तब उसने प्रार्थना की कि ’’अगर मेरा जहाज किनारे तक पहुँच जाये तो मैं गुरु नानक देव जी की गद्दी पर विराजमान सतगुरु को 500 मोहरें भेंट स्वरूप चढ़ाऊँगा।’’ सतगुरु की कृपा होने पर उसका जहाज सही ठिकाने पर पहुँच गया। उसके बाद जब मक्शन शाह लुबाना मोंहरे भेंट करने के लिए पंजाब आये।

सतगुरु के भक्तों के बताने पर वे ’बाबा बकाला साहिब’ आये। लेकिन यहाँ 22 गुरुओं को बैठा देखकर उन्हें आश्चर्य हुआ। तभी सही गुरु की तलाश करने के उद्देश्य से मक्खन शाह लुबाना ने यह सोचकर कि ’गुरु तो अंतर्यामी होता हैं, वह अपने आप बता देंगे कि कितनी मोहरें भेंट करने का वादा किया था।’ हर एक के आगे 2 मोहरें रखकर शीश झुकाया। 2 मोहरें पाकर ही सभी ढोंगी गुरु खुश हो गए। किसी ने भी बकायी रकम नहीं मांगी तो वह समझ गया कि इनमें से सही गुरु कोई नहीं है। क्योंकि उसने वादा तो 500 मोहरें देने का किया था।

उसके बाद मक्खन शाह लुबाना ने भक्तों से पूछताछ कि यहाँ कोई और भी गुरु रहता है क्या ? तब किसी भक्त ने एकांत में बैठे हुए गुरु तेग बहादुर जी के बारे में बताया। तब मक्खन शाह गुरु तेग बहादुर जी से मिलने गये। वहाँ जाकर भी मक्खन शाह ने पहले की तरह ही दो ही मोहरें आपजी को भेंट की। जिसे देखकर गुरु जी ने कहा, ’’गुरु की अमानत दे ही दी जाए तो भला है। ये दो मोहरें! क्यों बाकी अमानत कहाँ है?’’ यह सुनकर मक्खन शाह लुबाना को विश्वास हो गया कि सच्चे गुरु ’गुरु तेगबहादुर जी’ है, उसने आपजी को 500 मोहरें भेंट कर दी। साथ ही यह घोषणा कर दी ’सच्चा गुरु मिल गया है।’ जब यह लोगों ने सुना तो उन्हें पता चला गया कि गुरु तेग बहादुर जी ही नौवें गुरु हैं। गुरु तेग बहादुर जी को 44 वर्ष की आयु में, 20 मार्च 1665 ई. को ’गुरु की गद्दी’ पर विराजमान कर दिया। सिखों के नौवें गुरु गुरु तेग बहादुर जी हुए।

धीरमल द्वारा विरोध – Shri Guru Teg Bahadur Ji

जब यह बात 22 ढोंगियों के पास पहुँची तो उनका कारोबार बंद हो गया। इससे सबसे ज्यादा पीङा धीरमल को हुई। इन सबसे आहत होकर धीरमल तथा उनकेे साथियों ने गुरु तेग बहादुर जी को मारने का निश्चय किया। जब गुरु जी दूसरे दिन चांदनी लगाकर, दरिया बिछवाकर, दरबार सजाकर बैठे तथा संगत भारी संख्या में पहुंची तो धीरमल ने शीहे मसंद से आपजी पर गोली चलवाई दी जिससे गुरुजी जख्मी हो गए थे। साथ ही उसने गुरुजी को चढ़ाई गयी भेंट और सारा सामान लूट लिया।

जब मक्खन शाह लुबाना को पता चला तो वह गुरु जी के निरादर का बदला लेने के लिए अपने साथियों के साथ धीरमल के डेरे पहुँचा और सारा माल वापस ले लिया तथा धीरमल को गुरुजी के पास ले आये। गुरु तेग बहादुर जी ने धीरमल को क्षमा कर दिया तथा उसे सारे सामान के साथ वापस भेज दिया।

गुरुद्वारा थङा साहिब का इतिहास – History of Guru Teg Bahadur ji in Hindi

सिखों के नौवें गुरु श्री गुरु तेग बहादुर साहिब गुरुगद्दी पर विराजमान होने के बाद जब सन् 1665 ई. मक्खन शाह लुबाना को साथ लेकर बाबा बकाला से अमृतसर श्री सचखंड साहिब के दर्शन के लिए श्री हरिमंदिर साहिब पहुँचे। तब श्री हरिमंदिर साहिब के द्वार इस डर से बंद कर दिये कि कहीं गुरु जी श्री दरबार साहिब पर अपना अधिकार न कर ले।

इस समय गुरुद्वारा सोढ़ी परिवार के सदस्यों के नियंत्रण में था। गुरुजी के आने पर सोढ़ी परिवार के सदस्यों ने आपजी का विद्रोह किया। गुरु तेग बहादुर जी ने बाहर थङे (चबूतरे) पर बैठकर काफी समय तक इंतजार किया। उस जगह पर आज ’गुरुद्वारा थङा साहिब’ है।

गुरु जी के काफी समय तक इंतजार करने के बाद भी जब आपजी को प्रवेश नहीं दिया गया तो आपजी बाहर से ही नमस्कार करके पास के ’वल्ला गांव’ में चले गये। वल्ला गांव के लोगों ने आपजी की बहुत सेवा की। वल्ला गांव से गुरु तेगबहादुर जी बाबा बकाला वापस आ गये। उसके बाद गुरु जी करतापुर होते हुए कीरतपुर पहुँचे।

आनंदपुर साहिब की स्थापना – History of Guru Teg Bahadur ji in Hindi Language

गुरु तेगबहादुर जी जब कीरतपुर पहुँचे गए उसके बाद आपजी ने 2200 रुपये देकर वहां से कुछ दूर सतलुज नदी के किनारे माखोवाल गाँव की जमीन कहलूर के राजा दीपचंद से खरीद ली। इस जमीन पर आपजी ने 16 जून 1665 ई. को ’चक नानकी’ नामक एक शहर का निर्माण करवाया। बाद में इसका नाम बदलकर आपजी ने ’आनंदपुर साहिब’ रख दिया था। यहीं पर गुरुनानक खालसा का जन्म हुआ था।

सिख धर्म का प्रचार – Sikh Guru Tegh Bahadur

गुरु तेग बहादुर (Shri Guru Teg Bahadur ji) जी ने धर्म के सत्य ज्ञान के प्रचार-प्रसार एवं लोक कल्याणकारी कार्य के लिए कई स्थानों का भ्रमण किया। आनंदपुर से कीरतपुर, रोपङ, सैफाबाद के लोगों को संयम तथा सहज मार्ग का पाठ पढ़ाते हुए वे खिआला (खदल) पहुँचे। यहाँ से गुरुजी धर्म के सत्य मार्ग पर चलने का उपदेश देते हुए दमदमा साहब से होते हुए कुरुक्षेत्र पहुँचे। कुरुक्षेत्र से यमुना किनारे होते हुए कङा-मानिकपुर पहुँचे और यहाँ साधु भाई मलूकदास का उद्धार किया। यहाँ से गुरुजी प्रयाग, बनारस, पटना, असम आदि क्षेत्रों में गए, जहाँ उन्होंने लोगों के आध्यात्मिक, सामाजिक, आर्थिक, उन्नयन के लिए कई रचनात्मक कार्य किए।

आध्यात्मिक स्तर पर धर्म का सच्चा ज्ञान बाँटा। सामाजिक स्तर पर चली आ रही रूढ़ियों, अंधविश्वासों की कटु आलोचना कर नए सहज जनकल्याणकारी आदर्श स्थापित किए। शांति, क्षमा, सहनशीलता के गुणों वाले गुरु तेग बहादुर जी ने लोगों को प्रेम, एकता, भाईचारे का संदेश दिया। आपजी ने प्राणी सेवा एवं परोपकार के लिए कुएं खुदवाए, धर्मशालाएँ बनाई, पेङ लगवाए आदि लोक परोपकारी कार्य भी किए। उनके जीवन का प्रथम दर्शन यही था कि ’’धर्म का मार्ग सत्य और विजय का मार्ग है।’’

6 महीने प्रयागराज में रहने के बाद आपजी काशी पहुँचे यहां आपजी की ज्ञान चर्चा सुनकर यहाँ के विद्वान पंडित आपजी की प्रतिभा से काफी प्रभावित हुए। जब आपजी की कीर्ति सुनकर जौनपुर की संगत आपजी के पास आई तो जौनपुर के प्रमुख ’भाई गुरबख्श’ को गुरुजी ने वरदान देते हुए कि कहा कि तुम्हारी चौरासी लाख जूनिया कट गई है। अब तुम्हारे घर बङा ही भगत सूरमा परोपकारी पुत्र जन्म लेगा जो तुम्हारे वंश या कुल का नाम रोशन करेगा।

उसके बाद गुरुजी काशी से सासाराम पहुँचे और सासाराम से गया गये तथा गया से पटना पहुँचे। पटना में आपजी ने विश्राम किया और वहीं पर अपना सारा परिवार छोङकर आपजी कामरूप देश के राजा रामसिंह के साथ चले गये। आपजी की कृपा से राजा रामसिंह को विजय प्राप्त हुई थी।

गुरु गोविंद सिंह का जन्म – Guru Govind Singh ka Janm

इन्हीं यात्राओं के बीच 1666 में जब गुरुजी ढाका में थे तब पटना से आये एक गुरसिख ने पुत्र के जन्म का समाचार सुनाया। जिसका नाम ’गोविंद राय’ रखा गया, जो आगे चलकर दसवें गुरु ’गुरु गोविंद सिंह’ बने। इसके बाद गुरु जी 2 साल तक असम में रहते है। असम में रहने के बाद आपजी पटना होते हुए अपने परिवार के साथ पंजाब वापस लौट आये थे।

गुरु तेग बहादुर जी का लेखन कार्य – Guru Tegh Bahadur ji Ka Lekhan Karya

गुरु तेग बहादुर सिखों के नवें गुरु थे जिन्होंने प्रथम गुरु नानक द्वारा बताए गये मार्ग का अनुसरण करते रहे। आप जी ने 15 रागों में वाणी के 116 शब्दों की रचना की जिन्हें ’गुरु ग्रंथ साहिब’ में ’महला 9’ के शीर्षक से दर्ज किया गया है।

गुरु तेग बहादुर जी की शहादत – Guru Tegh Bahadur’s Martyrdom

जब गुरु तेग बहादुर (Sikh Guru Tegh Bahadur) जी अपने परिवार के साथ आनंदपुर लौटे आये। उस समय औरंगजेब के आदेश पर कश्मीर का गवर्नर इफ्तार खां वहां के पंडितों के ऊपर अत्याचार कर उन्हें जबरदस्ती मुसलमान बना रहा था। इस अत्याचार से डरकर कश्मीरी पंडित आपजी की शरण में आनंदपुर आये। पंडित कृपाराम ने गुरुजी से सहायता मांगी। जब गुरुजी ने कहा कि ’’यदि कोई महापुरुष अपना बलिदान देने को तैयार हो जाये तो ही इस धर्म को बचाया जा सकता है।’’ तब आपजी के पुत्र गोबिंद सिंह जी ने कहा कि ’आज के समय में आपसे बढ़कर कौन महापुरुष हो सकता है जो हिन्दू धर्म की रक्षा कर सके।’’ ऐसे वीर सुनकर गुरु तेग बहादुर जी ने गोविंद राय को अपने हृदय से लगा लिया। इसके बाद गुरु तेग बहादुर जी ने कश्मीरी पंडितों द्वारा एक संदेश औरंगजेब को पहुँचाया।

आपजी ने कश्मीर पंडितों को संदेश दिया कि, ’’औरंगजेब से यह कह दो, कि यदि तेग बहादुर जी इस्लाम कबूल कर लेंगे तो हम भी अपनी स्वेच्छा से इस्लाम धर्म को कबूल कर लेंगे और अगर गुरु जी ने आपके इस्लाम धर्म को कबूल नहीं किया तो हम भी आपके धर्म को कबूल नहीं करेंगे और आप हम पर किसी भी प्रकार का जुल्म इस्लाम धर्म को कबूल करने के लिए नहीं करोगे और जबरन इस्लाम धर्म को भी कबूल करने के लिए बाधित नहीं करोगे।’’ इसके बाद गुरु तेग बहादुर जी दिल्ली में औरंगजेब के दरबार में अपनी इच्छा से गए। कुछ समय बाद औरंगजेब ने हसन अब्दाल द्वारा गुरु तेग बहादुर को गिरफ्तार कर लिया।

आपजी को इस्लाम धर्म स्वीकार करने के लिए मजबूर किया गया तथा आपजी पर बहुत अत्याचार किये गये। इतना ही नहीं औरंगजेब ने इस्लाम धर्म कबूल करवाने के लिए बंदी बनाकर आपजी के सामने आपके दो शिष्यों को भी मौत के घाट उतार दिया। लेकिन अपने धर्म की रक्षा के लिए श्री गुरु तेग बहादुर जी ने इस्लाम धर्म को अपनाने से इंकार कर दिया। आपजी ने औरंगजेब को कहा कि अगर तुम सच्चे मुसलमान हो तो तुम्हारा धर्म यह शिक्षा नहीं देता कि किसी को इस्लाम धर्म धारण करने के लिए मजबूर करो।

औरंगजेब को गुरुजी के ये बात अपमानजनक लगी। अंततः औरंगजेब ने क्रोधित होकर दिल्ली के चांदनी चौक पर गुरु तेगबहादुर जी के शीश को काटने का हुक्म दे दिया। 11 नवम्बर, 1675 ई. (24 नवम्बर 1675) को गुरु तेग बहादुर जी ने चाँदनी चैक, दिल्ली में हंसते-हंसते अपना शीश कटाकर बलिदान दे दिया। सिखों के नौवें गुरु तेग बहादुर जी की याद में आपजी के ’शहीदी स्थल’ पर गुरुद्वारे का निर्माण किया गया जिसका नाम ’शीशगंज साहिब’ है।

गुरु तेग बहादुर शहीदी दिवस – guru tegh bahadur shaheedi diwas

आपजी को सबसे निस्वार्थ शहीद माना जाता है और उनकी शहादत को हर साल 24 नवंबर को गुरु तेग बहादुर शहीदी दिवस के रूप में मनाया जाता है।

गुरुद्वारा शीश गंज साहिब तथा गुरुद्वारा रकाब गंज साहिब उन स्थानों का स्मरण दिलाते हैं जहाँ गुरुजी की हत्या की गयी तथा जहाँ उनका अन्तिम संस्कार किया गया। विश्व इतिहास में धर्म एवं मानवीय मूल्यों, आदर्शों एवं सिद्धांत की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देने वालों में गुरु तेग बहादुर जी का स्थान अद्वितीय है। देश, धर्म को बचाने के लिए गुरु तेग बहादुर जी ने अपने प्राणों का बलिदान किया। गुरु तेग बहादुर जी को ’हिन्द-दी-चादर’ भी कहते है क्योंकि आपने हिंदुस्तान में हिंदू धर्म की रक्षा के लिए अपना बलिदान दे दिया था।

गुरु तेग बहादुर से संबंधित महत्त्वपूर्ण प्रश्न – Guru Tegh Bahadur Question Answers

1. तेग बहादुर जी का जन्म कब और कहाँ हुआ ?

उत्तर – 21 अप्रैल, 1621 ई. को अमृतसर पंजाब में

2. गुरु तेग बहादुर जी की मृत्यु कब और कहाँ हुई ?

उत्तर – 24 नवम्बर, 1675 चांदनी चैक, दिल्ली में

3. गुरु तेग बहादुर जी के पिता का नाम क्या था ?

उत्तर – गुरु हरगोविंद साहिब

4. गुरु तेग बहादुर जी की माता का नाम क्या था ?

उत्तर – माता नानकी जी

5. गुरु तेगबहादुर के बचपन का नाम क्या था ?

उत्तर – त्यागमल

6. त्यागमल जी की तेग की बहादुर तथा युद्ध में पराक्रम देखकर आपजी का नाम क्या रख दिया गया ?

उत्तर – तेग बहादुर

7. गुरु तेगबहादुर जी का विवाह कब और किसके साथ हुआ ?

उत्तर – गुरु तेगबहादुर जी का विवाह करतारपुर के लालचंद की पुत्री ’माता गुजरी कौर’ के साथ 4 फरवरी 1633 (15 आश्विन, संवत् 1689) में हुआ था।

8. गुरु तेगबहादुर जी के पुत्र का नाम क्या था ?

उत्तर – गुरु गोविन्द सिंह

9. सिखों के दसवें गुरु कौन थे ?

उत्तर – गुरु गोविन्द सिंह

10. गुरु तेग बहादुर जी गुरुगद्दी पर कब विराजमान हुए ?

उत्तर – गुरु तेग बहादुर जी को 44 वर्ष की आयु में, 20 मार्च 1665 ई. को ’गुरु की गद्दी’ पर विराजमान कर दिया।

11. सिखों के नवें गुरु कौन थे ?

उत्तर – गुरु तेग बहादुर जी

12. आनंदपुर साहिब की स्थापना किसने की ?

उत्तर – गुरु तेग बहादुर जी ने

13. गुरु तेगबहादुर जी के शहीदी स्थल पर जिस गुरुद्वारे का निर्माण किया गया उसका नाम क्या है ?

उत्तर – सिखों के नौवें गुरु तेग बहादुर जी की याद में आपजी के ’शहीदी स्थल’ पर गुरुद्वारे का निर्माण किया गया उसका नाम ’शीशगंज साहिब’ है।

14. गुरु तेगबहादुर जी ने औरंगजेब के किस अत्याचार का विरोध किया ?

उत्तर – जब गुरु तेग बहादुर जी अपने परिवार के साथ आनंदपुर लौटे आये। उस समय औरंगजेब के आदेश पर कश्मीर का गवर्नर इफ्तार खां वहां के पंडितों के ऊपर अत्याचार कर उन्हें जबरदस्ती मुसलमान बना रहा था। इस अत्याचार का विरोध गुरु तेगबहादुर जी ने किया था।

15. किस सिख गुरु की मृत्यु के लिए औरंगजेब जिम्मेदार है ?

उत्तर – गुरु तेग बहादुर जी

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